Thursday, August 12, 2010

roz...

काश तुम रोज़ भूलो मुझे


और मैं रोज़ याद दिलाऊं,

एक नए सिरे से शुरू हो जिंदगी रोज़

तो एक नई गरिमा से पेचान करवाऊं रोज़



हर मोड़ पर मैं ही मिलूं अचानक

कभी बेबस बेचारी तो कभी शोर मचाती

बस हर जगह मैं ही नज़र आऊं रोज़

काश तुम रोज़ मुझे भूलो

और मैं याद दिलाऊं रोज़



फिर एक बार तुम्हारी aakhein

chuen मेरा astitiv

तुम्हें देखे toh एक pal को dhadakna भूल जाए दिल

पेट में bal padein aakhein jhuk jaayein

तुमको ही अपना aaina banaun रोज़

काश तुम रोज़ मुझे भूलो

और मैं याद दिलाऊं रोज़

तुम्हें lagey की कोई और है

नया है कोई, तुम्हारी talaash का hisaa है कोई

फिर से प्यार कर बैठे हो

तुम्हारी हर talaash में ख़ुद को ही paaun रोज़

काश तुम रोज़ मुझे भूलो

और मैं याद दिलाऊं रोज़



तुम jaano मुझे एक नए सिरे से

एक नई जगह में

और मैं एक नए तुम से मिलूं

तुम्हारे सवालों के रोज़ नए जवाब dhoondhun

तुम्हारे jawabon के लिए नए सवाल banaun रोज़

काश तुम रोज़ मुझे भूलो

और मैं याद दिलाऊं रोज़



तुम्हारी kalpana भी मैं, तुम्हारी कविता भी मैं

हर रचना का आदि अंत मैं

तुम में बसे कवि की aatma में समा जाऊँ

या तुम्हारे khayalon की syaahi में badal jaaun रोज़

तुम्हें कभी paaun तो कभी न paaun

कभी jiyun तो कभी मर jaaun

आज की ही तरह guzar जाऊँ रोज़

काश तुम रोज़ मुझे भूलो

और मैं याद दिलाऊं रोज़

No comments:

Post a Comment